हमारी नमस्कार झूठी है, हमारा प्रेम झूठा है, हमारी प्रार्थना झूठी है। कैसे एक आदमी सुबह ही सुबह आपको रास्ते पर मिल जाता है, आप हाथ जोड़ते हैं, नमस्कार करते हैं और कहते हैं,मिल कर बड़ी खुशी हुई। और मन में सोचते हैं कि इस दुष्ट का चेहरा सुबह से ही कैसे दिखाई पड़ गया! तो आप सरल कैसे हो सकेंगे? ऊपर कुछ है, भीतर कुछ है। ऊपर प्रेम की बातें हैं,भीतर घृणा के कांटे हैं। ऊपर प्रार्थना है, गीत हैं, भीतर गालियां हैं, अपशब्द हैं। ऊपर मुस्कुराहट है, भीतर आंसू हैं। तो इस विरोध में, इस आत्मविरोध में, इस सेल्फ कंट्राडिक्यान में जटिलता पैदा होगी, उलझन पैदा होगी। परमात्मा कठिन नहीं है, लेकिन आदमी कठिन है। कठिन आदमी को परमात्मा भी कठिन दिखाई पड़ता हो तो कोई आश्चर्य नहीं। मैंने सुबह कहा कि परमात्मा सरल है। दूसरी बात आपसे कहनी है, यह सरलता तभी प्रकट होगी जब आप भी सरल हों। यह सरल हृदय के सामने ही यह सरलता प्रकट हो सकती है। लेकिन हम सरल नहीं हैं। क्या आप धार्मिक होना चाहते हैं? क्या आप आनंद को उपलब्ध करना चाहते हैं? क्या आप शांत होना चाहते हैं?क्या आप चाहते हैं आपके जीवन के अंधकार में सत्य की ज्योति उतरे? तो स्मरण रखें— पहली सीढ़ी स्मरण रखें— सरलता के अतिरिक्त सत्य का आगमन नहीं होता है। सिर्फ उन हृदयों में सत्य का बीज फूटता है जहां सरलता की भूमि है। देखा होगा, एक किसान बीज फेंकता है। पत्थर पर पड़ जाए बीज, फिर उसमें अंकुर नहीं आता। क्यों? बीज तो वही था! और सरल सीधी जमीन पर पड़ जाए बीज, अंकुरित हो आता है। बीज वही है! लेकिन पत्थर कठोर था, कठिन था,बीज असमर्थ हो गया, अंकुरित नहीं हो सका। जमीन सरल थी, सीधी थी, साफ थी, नरम थी, कठोर न थी, कोमल थी,बीज अंकुरित हो गया। पत्थर पर पड़े बीज में और भूमि पर गिरे बीज में कोई भेद न था। न ही उस बीज में पल्लव आएंगे, न ही उस बीज में शाखाएं फूटेंगी, न ही उस बीज में फूल लगेंगे, न ही उस बीज से सुगंध बिखरेगी। इसलिये आज का पहला सूत्र आपसे कहना चाहता हूं—सरल हो जाएं। और यह मत पूछें कि हम सरल कैसे हो जाएं, क्योंकि जहां कैसे का भाव शुरू हुआ, कठिनता शुरू हो जाती है। जैसे ही आपने पूछा— मैं कैसे हो जाऊं सरल? बस आप कठिन होना शुरू हो गए। सरलता तो स्वभाव है। सरल होना नहीं पड़ता है,केवल कठिन होना बंद कर दें, और आप पाएंगे कि सरल हो गए हैं। मैं यह मुट्ठी बांध लूं और फिर पूछने लगे लोगों से कि मैं मुट्ठी कैसे खोलूं? तो कोई मुझसे क्या कहे? मुट्ठी खोलनी नहीं पड़ती, बांधनी जरूर पड़ती है। मुट्ठी खोलनी नहीं पड़ती,बांधनी जरूर पड़ती है। अब मैं मुट्ठी बांधे हूं और लोगों से पूछता हूं मुट्ठी कैसे खोलूं? जो जानता है वह कहेगा कि सिर्फ बांधना बंद कर दें, मुट्ठी खुल जाएगी। बांधें मत, खुला होना मुट्ठी का स्वभाव है। धन्य हैं वे जो सरल हैं ! ओशो |
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