कइयों की तरह इन चिरंजीव शब्दोमें मुझे भी अपना प्रतिबिंब महसूस होता है -जय वसावडा कोई नहीं पराया, मेरा घर संसार है।
मैं ना बँधा हूँ देश काल की जंग लगी जंजीर में, मैं ना खड़ा हूँ जाति−पाति की ऊँची−नीची भीड़ में... मेरा धर्म ना कुछ स्याही−शब्दों का सिर्फ गुलाम है मैं बस कहता हूँ कि प्यार है तो घट−घट में राम है... मुझ से तुम ना कहो कि मंदिर−मस्जिद पर मैं सर टेक दूँ मेरा तो आराध्य आदमी− देवालय हर द्वार है ! कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।। कहीं रहे कैसे भी मुझको प्यारा यह इन्सान है, मुझको अपनी मानवता पर बहुत-बहुत अभिमान है,
अरे नहीं देवत्व मुझे तो भाता है मनुजत्व ही, और छोड़कर प्यार नहीं स्वीकार सकल अमरत्व भी, मुझे सुनाओ तुम न स्वर्ग-सुख की सुकुमार कहानियाँ, मेरी धरती सौ-सौ स्वर्गों से ज्यादा सुकुमार है! कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।। मुझे मिली है प्यास विषमता का विष पीने के लिए, मैं जन्मा हूँ नहीं स्वयँ-हित, जग-हित जीने के लिए,
मुझे दी गई आग कि इस तम को मैं आग लगा सकूँ, गीत मिले इसलिए कि घायल जग की पीड़ा गा सकूँ, मेरे दर्दीले गीतों को मत पहनाओ हथकड़ी, मेरा दर्द नहीं मेरा है, सबका हाहाकार है ! कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।। मैं सिखलाता हूँ कि जिओ औ' जीने दो संसार को, जितना ज्यादा बाँट सको तुम बाँटो अपने प्यार को, हँसी इस तरह, हँसे तुम्हारे साथ दलित यह धूल भी, चलो इस तरह कुचल न जाये पग से कोई शूल भी,
सुख न तुम्हारा सुख केवल जग का भी उसमें भाग है, फूल डाल का पीछे, पहले उपवन का श्रृंगार है ! कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।। *** प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो। क़ब्र-सी मौन धरती पड़ी पाँव परल शीश पर है कफ़न-सा घिरा आसमाँ, मौत की राह में, मौत की छाँह में चल रहा रात-दिन साँस का कारवाँ, जा रहा हूँ चला, जा रहा हूँ बढ़ा, पर नहीं ज्ञात है किस जगह हो? किस जगह पग रुके, किस जगह मगर छुटे किस जगह शीत हो, किस जगह घाम हो, मुस्कराए सदा पर धरा इसलिए जिस जगह मैं झरूँ उस जगह तुम खिलो। प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए, जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो। प्रेम का पंथ सूना अगर हो गया, रह सकेगी बसी कौन-सी फिर गली? यदि खिला प्रेम का ही नहीं फूल तो, कौन है जो हँसे फिर चमन में कली? प्रेम को ही न जग में मिला मान तो यह धरा, यह भुवन सिर्फ़ श्मशान है, आदमी एक चलती हुई लाश है, और जीना यहाँ एक अपमान है, आदमी प्यार सीखे कभी इसलिए रात-दिन मैं ढलूँ, रात-दिन तुम ढलो। प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए, जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो। एक दिन काल-तम की किसी रात ने दे दिया था मुझे प्राण का यह दिया, धार पर यह जला, पार पर यह जला बार अपना हिया विश्व का तम पिया, पर चुका जा रहा साँस का स्नेह अब रोशनी का पथिक चल सकेगा नहीं, आँधियों के नगर में बिना प्यार के दीप यह भोर तक जल सकेगा नहीं, पर चले स्नेह की लौ सदा इसलिए जिस जगह मैं बुझूँ, उस जगह तुम जलो। प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो। रोज़ ही बाग़ में देखता हूँ सुबह, धूल ने फूल कुछ अधखिले चुन लिए, रोज़ ही चीख़ता है निशा में गगन- 'क्यों नहीं आज मेरे जले कुछ दीए ?' इस तरह प्राण! मैं भी यहाँ रोज़ ही, ढल रहा हूँ किसी बूँद की प्यास में, जी रहा हूँ धरा पर, मगर लग रहा कुछ छुपा है कहीं दूर आकाश में, छिप न पाए कहीं प्यार इसलिए जिस जगह मैं छिपूँ, उस जगह तुम मिलो। प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो। प्रेम का पंथ सूना अगर हो गया, रह सकेगी बसी कौन-सी फिर गली? यदि खिला प्रेम का ही नहीं फूल तो, कौन है जो हँसे फिर चमन में कली? प्रेम को ही न जग में मिला मान तो यह धरा, यह भुवन सिर्फ श्मशान है, आदमी एक चलती हुई लाश है, और जीना यहाँ एक अपमान है, आदमी प्यार सीखे कभी इसलिए राल-दिन में ढलूँ रात-दिन तुम ढलो। प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो। ~ 🙏 |
--
You received this message because you are subscribed to the Google Groups "Keep_Mailing" group.
To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an email to
keep_mailing+unsubscribe@googlegroups.com.
To post to this group, send email to
keep_mailing@googlegroups.com.
Visit this group at
https://groups.google.com/group/keep_mailing.
To view this discussion on the web visit
https://groups.google.com/d/msgid/keep_mailing/CAH3M5OuX4AUk%2B0hAREKs%3DXEoOERoQF5Egn9GZyjFRu2rdrN7Fw%40mail.gmail.com.
For more options, visit
https://groups.google.com/d/optout.
No comments:
Post a Comment