प्रेम अंतर्मन को छूने की कला है, एक कोमल एहसास , एक सुखद अनुभूति, एक अबूझ पहेली। जितने व्यक्ति उतनी तरह से इसकी अभिव्यक्ति, उतने ही इसके नाम। प्रेम खिलता है मुक्ति के आकाश में; प्रेम का जन्म होता है स्वतंत्रता के परिवेश में ।
मनुष्य-जीवन का सारा उपक्रम, सारा श्रम, सारी दौड़, सारा संघर्ष अंतिम रूप से प्रेम पर ही केंद्रित है। समस्त जीवन के केंद्र में एक ही प्यास है, एक ही अभीप्सा है— और वह है प्रेम ।
एक अदृश्य आकर्षण, सब कुछ न्योछावर करने की इच्छा, दो व्यक्तियों के मन के बीच हो तो प्रेम , शरीर के बीच हो तो वासना,यदि वतन -समाज से हो तो जज्बा, प्रभु से हो तो भक्ति , वस्तुओ से हो तो आसक्ति।
प्यार वह अवस्था जहाँ सारे विचार, सारी इच्छाए सिमट कर एक बिंदु पर केंद्रित हो जाये। अपने पराये का भेद मिट जाए, सिर्फ और सिर्फ खो जाने की चाहत रह जाए। जब प्रेम अपने शुद्धतम रूप में प्रकट होता है--अकारण, बेशर्त--तब मंदिर बन जाता है। जब प्रेम सफल होता है, तो जीवन सार बन जाता है। जब प्रेम सफल होता है, जीवन एक सार्थक, कृतार्थता और धन्यता में परिणित हो जाता है।
प्रेम कोई व्यवसाय नही, कोई लेन देन नही, सिर्फ समर्पण है, एक दूजे में खो जाना है। वहीं अहंकार एक दूरी बनाए रखने में विश्वास रखता है, अहंकार क्षुद्र कर देता है, सिकोड़ देता है, बहुत छोटा बना देता है।
जहाँ अहंकार होता है वहां प्रेम नही, क्योंकि अहंकार मिल्कियत चाहता है। जितनी मालकियत की कोशिश होती है, उतना फासला बड़ा होता चला जाता है, उतनी दूरी बढ़ती चली जाती है; क्योंकि प्रेम हिंसा नहीं है, मालकियत हिंसा है, जहाँ ईर्ष्या है, वहां प्रेम संभव नहीं है। जहां प्रेम है, वहां ईर्ष्या संभव नहीं है।
जिन्होंने निस्वार्थ प्रेम किया उन सबने यहीं कहा कि वहाँ दुख नहीं है,वहाँ आनंद ही आनंद है ।
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